वह नारी जिसने पर्यावरण के लिए ना मात्र क़दम उठाया बल्कि एक आंदोलन को जन्म दिया, गौरा देवी वह नारी जिसने चिपको आंदोलन की शुरुआत की।
चिपको आंदोलन फोटो गूगल : HiwanliKanthi
परिचय
भारत के पर्यावरण आंदोलन के इतिहास में जिन महिलाओं का नाम सबसे पहले लिया जाता है, उनमें गौरा देवी अग्रणी स्थान रखती हैं। वे साधारण गृहणी और ग्रामीण महिला होते हुए भी प्रकृति के लिए उस समय खड़ी हो गईं, जब बड़े-बड़े नेता और अधिकारी मौन थे।
प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि
गौरा देवी का जन्म वर्ष 1925 में टिहरी गढ़वाल जिले के लाता गाँव (उत्तराखंड) में हुआ था। कम उम्र में ही उनका विवाह रैणी गाँव में हुआ। मात्र 22 वर्ष की उम्र में ही उनके पति का देहांत हो गया, जिसके बाद उन्होंने अपने बेटे और परिवार की ज़िम्मेदारी अकेले संभाली।
ग्रामीण परिवेश में रहने वाली गौरा देवी ने औपचारिक शिक्षा भले ही प्राप्त न की हो, लेकिन जीवन के अनुभवों ने उन्हें मजबूत और संवेदनशील बना दिया था। वे जानती थीं कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि गाँव की जीवनरेखा हैं। पानी, लकड़ी, चारा और औषधियाँ – सब कुछ इन्हीं जंगलों से मिलता था।
फोटो गौरा देवी Hiwanlikanthi
चिपको आंदोलन की शुरुआत
सत्तर के दशक में उत्तराखंड के जंगल बड़े पैमाने पर ठेकेदारों द्वारा काटे जा रहे थे। इसका विरोध धीरे-धीरे जन आंदोलन का रूप लेने लगा। 1973 में रैणी गाँव के जंगलों को काटने के आदेश दिए गए। उस समय गाँव के पुरुष मजदूरी के काम से बाहर गए हुए थे।
ठेकेदारों के लोग गाँव पहुँचे और पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाने लगे। यह ख़बर जब गौरा देवी तक पहुँची तो उन्होंने गाँव की महिलाओं और बच्चों को इकट्ठा किया और जंगल की ओर चल पड़ीं। उन्होंने ठेकेदारों को रोकते हुए कहा –
“ये जंगल हमारी माँ हैं, इन्हें हम नहीं कटने देंगे।”
गौरा देवी और गाँव की महिलाओं ने पेड़ों को गले से लगाकर लकड़हारों को चुनौती दी। वे पूरी रात जंगल में डटी रहीं। महिलाओं की इस एकता और साहस ने ठेकेदारों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। यही घटना आगे चलकर इतिहास में दर्ज हुई और इसे “चिपको आंदोलन” कहा गया।
गौरा देवी का साहस और नेतृत्व
गौरा देवी ने अपने जीवन से यह दिखाया कि महिलाएँ केवल घर तक सीमित नहीं हैं, वे समाज की दिशा भी बदल सकती हैं। उनका नेतृत्व केवल पेड़ों की रक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने पूरे समाज को यह संदेश दिया कि प्रकृति के बिना जीवन संभव नहीं है।
उनके प्रयासों से उत्तराखंड के जंगलों की कटाई पर रोक लगी और धीरे-धीरे सरकार को भी जंगल संरक्षण की नीतियाँ बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा।
महिलाओं संग गौरा देवी ( चिपको आंदोलन ) Hiwanlikanthi
उनके आंदोलन ने देश और विदेश में पर्यावरण के मुद्दों को नया आयाम दिया।
उनकी प्रेरणा से बाद में कई पर्यावरणीय आंदोलन खड़े हुए।
उत्तराखंड की महिलाएँ आज भी उन्हें अपने संघर्ष और हिम्मत की प्रतीक मानती हैं।
निधन
गौरा देवी का निधन 4 जुलाई 1991 को हुआ। वे भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी स्मृति और संघर्ष आज भी हर उस व्यक्ति को प्रेरित करते हैं, जो प्रकृति और पर्यावरण के लिए चिंतित है।
निष्कर्ष
गौरा देवी की जीवनी हमें सिखाती है कि साधारण जीवन जीने वाला व्यक्ति भी यदि दृढ़ निश्चय कर ले तो बड़ा परिवर्तन ला सकता है। उन्होंने पेड़ों से लिपटकर यह संदेश दिया कि जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि जीवन की धड़कन हैं।
उनकी विरासत आज भी हमें यह प्रेरणा देती है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण की रक्षा करना हमारा सबसे बड़ा कर्तव्य है।
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87 thoughts on “चिपको आंदोलन की जननी गौरा देवी की कहानी”
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